شب قدر وہ شب ہے جب فرشتے زميں کو آسمان سے متصل، دلوں پرنور کي بارش اور زندگي کو فضل ولطف الھي سے منور کرديتے ہيں ۔ شب قدر روحاني سلامتي کي شب ہےدلوں اور جانوں کي سلامتي کي شب ہے ۔
شب قدر درحقيقت شب امام زمانہ اور شب ولايت ہے حضرت ولي عصر اوراحنا لہ الفداء کي طرف متوجہ ہونے کي شب ہے کيونکہ سارا عالم وجود امام زمانہ کے محور کے گرد حرکت کرتا ہے .
اس دن اسلامي جمہوريہ ايران تباہي کي طرف گامزن ہوجاۓ گا جب وہ بھول جاۓ کہ اس کا نمونہ عمل حضرت علي ابن ابي طالب عليہ السلام جيسي بزرگ شخصيت ہے ۔
ہماري قوم علوي قوم اور حضرت اميرالمومنين عليہ الصلاۃ والسلام کي عاشق و مريد ہے ۔
اسلامي انقلاب حضرت اميرالمومنين کي تعليمات کا نمونہ ہے اور اسي پر ايران کا اسلامي نظام قائم ہے ۔
حضرت اميرالمومنين علي عليہ السلام کي حکومت قيام عدل و انصاف ،مظلوم کي حمايت ،ظالم کے مقابلے اور ہرحال ميں حق کي حمايت کے سلسلے ميں ايسي مثالي حکومت ہے جس پر ضرورعمل ہونا چاہيئے ۔
تاريخ بشر ميں نظم و ضبط کے پابند انسان روحاني کمالات کي اعلي منزلوں پربھي فائز ہوتے ہي ان ميں ايک حضرت اميرالمومنين علي عليہ السلام بھي ہيں ۔
حضرت امير المومنين سب کے لئے مکمل نمونہ عمل ہيں ۔
ہم اميرالمومنين حضرت علي عليہ السلام کي تعليمات پر عمل کرکے اپنے ملک و قوم کي عظيم آرزو يعني سماجي انصاف تک پہنچ سکتے ہيں ۔
عدل و انصاف حقيقي معني ميں اميرالمومنين حضرت اميرالمومنين کے وجود مقدس ان کي رفتا وگفتار اور ان کے تقوے اور ان کي توجہ ميں موجود ہے ۔
فردي لحاظ سے اميرالمومنين حضرت علي عليہ السلام تقوي کا واضح نمونہ اور حکومت وسياست و خلافت کے ميدانوں ميں آپ کي کارکردگي کي اساس عدل وانصاف ہے۔
حضرت اميرالمومنين کي حکومت کا امتياز عدل وانصاف ہے يعني عدالت مطلق يعني آپ اپني کسي ذاتي مصلحت کو عدل وانصاف پر مقدم نہيں کرتے ہيں ۔
برسوں سے کوشش کي جا رہي ہے کہ قدس فراموش ہوجاۓ ليکن عالمي يوم القدس نے اس سازش کو ناکام بنا ديا ہے۔
يوم قدس ايران سے مخصوص نہيں ہے بلکہ عالم اسلام سے متعلق ہے ۔
يوم قدس حضرت امام خميني کي کبھي نہ فراموش ہونے والي يادگار ہے۔
يوم قدس مسلمانوں کے اہم ترين اھداف ومقاصد پرتاکيد کرنے کا دن ہے ۔
يوم قدس عالم اسلام کے اھم ترين مسئلے پر تاکيد کرنےکا دن ہے ۔
يوم قدس مسلمان قوموں کي آزمائيش کا دن ہے۔
يوم قدس ايسي عظيم تحريک ہے جس نے يقينا سامراج سے مقابلے ميں گہرے اثرات چھوڑے ہيں اور چھوڑتي رہے گي .
يوم قدس صيہوني حکومت کے نحس چہرے پر زناٹے دار طمانچہ ہے۔
عيد فطر کا دن عبادت و مغفرت کا دن ہے ۔
عيد فطر کا دن اتحاد برادري اور اجتماع کا دن ہے ۔
عيد سعيدفطر مسلمانوں کي عيد اسلام و پيغمبر اسلام کي سربلندي کا سبب اور اسلام ميں کبھي نہ ختم ہونے والا خزانہ ہے ۔
عيد سعيد فطر کے موقع پر عالم اسلام کو اس مبارک دن سے عبرت حاصل کرنے اور خدا کي طرف لوٹ کرجانے کےلۓ استفادہ کرنا چاہيے ۔
دين الھي کا نفاذ سب سے اہم صفت اور تمام صفتوں کي بنيادہے اور يہي صفت اميرالمومنين عليہ السلام کي زندگي اور آپ کي حکومت کا خاصہ تھي۔
حضرت اميرالمومنين عليہ السلام ولايت اسلام کے مظہرکامل اور ولي خدا تھے ۔
حضرت اميرالمومنين علي عليہ السلام قوت و اقتدار رکھنے کے باوجود سب سے زيادہ مظلوم تھے۔
حضرت علي عليہ السلام ان نادر شخصيتوں ميں سےہيں جو ماضي اور في زمانہ نہ صرف شيعوں کے درميان بلکہ تمام مسلمانوں کے درميان بلکہ تمام آزاد ضمير انسانوں کے درميان مقبول ہيں۔
حضرت اميرالمومنين علي عليہ السلام تاريخ کي مظلوم ترين شخصيتوں ميں ہيں ،آپ کي زندگي کے ہرہر قدم پر مظلوميت دکھائي ديتي ہے آپ کي شہادت بھي مظلومانہ تھي ۔
حضرت اميرالمومين علي عليہ السلام تاريخ کي نہايت پرکشش شخصيت ہيں ۔
حضرت امير المومنين علي عليہ السلام کا حکمت آميز کلام عالموں دانشوروں اور مفکرين کےلۓ مشعل راہ ہے ۔
حضرت علي عليہ السلام کوپہچان لينا کافي نہيں بلکہ آپ کي شناخت آپ سے تقرب کا ذريعہ بنے۔
حقيقي معني ميں حضرت علي عليہ السلام فضيلتوں اورکمالات کا مکمل نمونہ ہيں ،حقيقي معني ميں حضرت علي عليہ السلام ہي انسانوں کے سب سے عظيم رھنما ہيں ۔
امام حسین (ع) کے چند زرین اقوال حدیث -۱-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” یا اعرابی نحن قوم لا نعطی المعروف الا علی قدر المعرفة “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” ہم اہل بیت بخشش نہیں کرتے مگر لوگوں کی معرفت کے مطابق“۔
حدیث -۲-
قال الامام الحسین علیہ السلام :
” ان اجود الناس من اعطی من لا یرجوہ “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں:
” سب سے بڑا سخی وہ انسان ہے جو کسی ایسے کو عطا کرے جس سے کسی قسم کی توقع نہ ہو “
حدیث -۳-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” ان اعفیٰ الناس من عفا عن قدرة “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” سب سے بڑا عفو کرنے والا انسان وہ ہے جو قدرت ہونے کے باوجود معاف کر دے “ ۔
حدیث -۴-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” ان اوصل الناس من وصل من قطعہ “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :
” سب سے زیادہ صلہٴ رحم کرنے والا انسان وہ ہے جو قطع رحم کرنے والوں سے تعلقات قائم کرے “ ۔
حدیث -۵-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” من نفس کربة مومن فرج اللہ عنہ کرب الدنیا و الاخرة “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں:
” جو کسی مومن کے کرب و غم کو دور کرے ،خدا اسکے دنیا و آخرت کے غم و اندوہ کو دور کرے گا “۔
حدیث -۶-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” موت فی عز خیر من حیات فی ذل “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :
” ذلت کی زندگی سے عزت کی موت کہیں بہتر ہے “ ۔
حدیث -۷-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” ان حوائج الناس الیکم من نعم اللہ علیکم فلا تملوا النعم فتحور نقما “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :
” خدا کی نعمتوں میں سے ایک، لوگوں کو تمھارے پاس حاجت کے لئے آنا ہے پس اس نعمت پر حزن و ملال محسوس نہ کرو ورنہ یہ نعمت ، نقمت میں تبدیل ہو جائیگی “۔
حدیث -۸-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” ایھا الناس من جاد ساد ، و من بخل رذل “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :
” لوگو! جود و سخاوت کرنے والا سردارقرار پاتا ہے ، اور بخل کرنے والا ذلیل و رسوا ہوتا ہے “۔
حدیث -۹-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
”ان المومن لا یسئی و لا یعتذر والمنافق کل یوم یسئی و یعتذر “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں:
” مومن نہ برائی کرتا ہے نہ ہی عذر پیش کرتا ہے جب کہ منافق ہر روز برائی کرتا ہے اور ہر روز عذر خواہی کرتا ہے “ ۔
حدیث -۱۰-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” من احبک نھاک و من ابغضک اغراک “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں:
”دوست وہ ہے جو تمہیں برائی سے بچائے دشمن وہ ہے جو تمہیں برائیوں کی ترغیب دلائے “۔
حدیث -۱۱-
قال الامام الحسین علیہ السلام:
” انی لا اری الموت الا سعادہ ولا الحیاة مع الظالمیں الابرما “
ترجمہ:
حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :
” میں موت کو سعادت اور ظالموں کے ساتہ زندگی کو لائق ملامت سمجہتا ہوں “इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम 1- मित्र व शत्रु
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि आपका मित्र वह है जो आपको बुराईयों से रोके व आप का शत्रु वह है जो आपको बुरे कार्यों का निमन्त्रण दे।
2- वसीयत
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि अल्लाह से डरो व अपने स्वास्थ का ध्यान रखकर अपनी आयु को बढ़ाओ। और उन लोगों की भाँती न बनो जो दूसरों को पाप से डराते हैं परन्तु स्वंय पाप से नहीं डरते।
3- जिहाद के प्रकार
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि जिहाद चार प्रकार के हैं इन मे से दो जिहाद सुन्नत हैं तथा दो जिहाद फ़र्ज़ हैं।
क- फ़र्ज़ जिहाद –
(अ) व्यक्ति का स्वंय अपने वश से लड़ना (अर्थात व्यक्ति अल्लाह के आदेशों की अवहेलना न करना) तथा यह महान् जिहाद है।
(आ) नास्तिक लोगों के साथ लड़ना
ख- सुन्नत जिहाद
(अ) शत्रु से जिहाद तथा यह जिहाद प्रत्येक उम्मत(समाज) पर अनिवार्य किया गया है। अगर यह जिहाद न किया जाये तो उम्मत(समाज) संकट मे घिर जायेगी और यह संकट स्वंय उम्मत द्वारा उत्पन्न किया गया होगा। इस प्रकार का जिहाद सुन्नत है। तथा इस जिहाद की सीमा यहाँ तक है कि इमाम उम्मत के साथ शत्रु की खोज मे निकले तथा उनसे जिहाद करे।
(आ) दूसरा सुन्नत जिहाद यह है कि मनुष्य सुन्नतों को क्रियान्वित करने के लिए प्रयास करे। हज़रत पैगम्बर ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति जो सुन्नतों व अच्छाईयों को क्रियान्वित करता है उसको उसके कार्यो का बदला दिया जायेगा। तथा क़ियामत तक जो व्यक्ति उसके द्वारा क्रियान्वित सुन्नत पर पगबध होंगे उनका पुण्य भी उसको दिया जायेगा इस प्रकार कि उस सुन्नत पर पगबध होने वालों के पुण्य मे कोई कमी नही की जायेगी।
4- संसार का बदला रूप
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला की यात्रा के समय कहा कि संसार परिवर्तित व अपरिचित होगया है। इसने परिचितों की ओर से मुहँ मोड़ लिया है। यह संसार केवल एक चरी हुई चरागाह के समान शेष रह गया है। क्या आप नही देखते कि हक़ (शोभनीय) पर अमल नही हो रहा है व बातिल(अशोभनीय) से मना नही किया जारहा है। ऐसी स्थिति मे मोमिन (आस्तिक) का मरजाना ही अच्छा है। इस स्थिति मे मैं मृत्यु को भलाई तथा अत्याचारियों के साथ जीवित रहने को मृत्यु समझता हूँ। वास्तव मे लोग संसारिक मोह माया मे फसे हैं व धर्म केवल उनके कथन तक सीमित है। जब उनको विपत्ति के समय परखा जाता है तो धार्मिक लोग कम निकलते हैं।
6 –नेअमतो की अधिकता
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह जब किसी को अपनी ओर से ग़ाफ़िल (निश्चेत) करता है तो उसको अधिक नेअमते प्रदान करता है। तथा उससे शुक्रिये (धन्यवाद) की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) ले लेता है।
7- इबादत(आराधना)
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि एक समुदाय अल्लाह की इबादत स्वर्ग प्राप्ति के लिए करता है। तथा यह इबादत व्यापारियों वाली इबादत है।
एक समुदाय अल्लाह की इबादत नरक के भय के कारण करता है। तथा यह इबादत दासों वाली इबादत है।
एक समुदाय अल्लाह की इबादत इस लिए करता है कि अल्लाह को इबादत योग्य समझता है।तथा यह इबादत सर्वश्रेष्ठ इबादत है व सवतन्त्रता का संकेत देती है।
8- अत्याचार न करो
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के अतिरिक्त जिसकी कोई सहायता करने वाला न हो उस व्यक्ति पर कभी भी अत्याचार न करो।
9- आवश्यकता
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इन तीन लोगों के अतिरिक्त आपकी अवश्यक्ता को कोई पूरा नही कर सकता (1) दीनदार (अर्थात धार्मिक व्यक्ति ) (2) वीर पुरूष (3) अच्छा व्यक्तित्व रखने वाला।
10- बुद्धि मत्ता व मूर्खता
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि बुद्धिजीवियों की संगत मे बैठना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।मुसलमानो का आपस मे झगड़ना मूर्खता का प्रतीक है। अपने कथन की स्वंय आलोचना करना ज्ञानी होने का प्रतीक है।
11- नरक से मुक्ति
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के भय से रोना नरक से मुक्ति का कारक है।
12- कंजूस
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि दूसरों को सलाम करने से बचने वाला व्यक्ति कंजूस है।
13- पापीयों के अनुसरण का पल
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगर कोई किसी के पास अल्लाह के आदेशों की अवहेलने करने के लिए एकत्रित हों तो वह जो इच्छायें ऱखते उनकी की पूर्ति न होगी और वह जिन चीज़ों से बचना चाहते हैं उनमे ग्रस्त हो जायेंगे।
14- नीचता स्वीकार नही करूँगा
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अल्लाह की सौगन्ध के साथ कहता हूं कि मैं कभी भी नीचता को स्वीकार नही करूँगा तथा क़ियामत (प्रलय ) के दिन हज़रत फ़ातिमा ज़हरा अपने हज़रत पिता से भेंट करेगीं और उन समस्त अत्याचारों की अपने पिता से शिकायत करेंगी जो पैगम्बर की उम्मत ने उनकी संतान पर किये हैं। और वह व्यक्ति जिसने हज़रत फ़ातिमा की संतान पर अत्याचार किये वह स्वर्ग मे नही जासकता।
15- क़ियाम(आन्दोलन) के उद्देश्य
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अपने आपको मनवाने, सुखमय जीवन व्यतीत करने,उपद्रव मचाने या अत्याचार करने के लिए नही निकला हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ कि इस्लामी समाज मे सुधार करू तथा लोगों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करूँ व बुराईयों से रोकूँ व अपने नाना व पिता की सुन्नत(शैली) को क्रियान्वित करूँ।
16- शासन का अधिकार
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि हम अहलेबैत शासन के शासन कर रहे लोगों से अधिक हक़दार हैं।
17- इमाम के लक्षण
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इमाम वह है जो कुऑनानुसार कार्य करे,न्याय के मार्ग पर चले व हक़ का अनुसरण करे तथा स्वंय को अल्लाह की प्रसन्नता के लिए समर्पित करदे।
18- शासन का अधिकार
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखने चाहते हो तो यह कार्य अल्लाह की प्रसन्नता के लिए बहुत अच्छा है।हम पैगम्बर के अहलेबैत शासन के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों से अधिक अधिकारी हैं।
19- अत्याचार के सम्मुख चुप रहने का फल
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो पैगम्बर ने कहा कि अगर कोई देखे कि एक अत्याचारी शासक अल्लाह द्वारा हराम की गयी चीज़ों को हलाल कर रहा है, अपने वचन से फिर रहा है, पैगम्बर की सुन्नत का विरोध कर रहा है, तथा लोगों के मध्य गुनाह व अत्याचार के आधार पर कार्य कर रहा है।तो अगर कोई इस स्थिति मे उसका क्रियात्मक व विचारात्मक विरोध न करे तो वह भी उस अत्याचारी के साथ ही नरक मे डाला जायेगा।
20- अल्लाह को नाराज़ करना
हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि वह व्यक्ति कभी भी सफल नही हो सकते जो अल्लाह की प्रजा को प्रसन्न करने के लिए अल्लाह को नाराज़ करदे।