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PostHeaderIcon اہل سنّت کے منابع سے پیغمبر اعظم ﷺکی سیرت طیبہ اور وحدت

اہل سنّت  کے منابع سے پیغمبر اعظم ﷺکی سیرت طیبہ اور وحدت


یہاں ہم اختصار کی بنا پر صرف رسول اکرم ﷺکی سیرت طیبہ سے وحدت کے چند نمونے پیش کرتے ہیں تاکہ ہمیں یہ معلوم ہو جائے کہ انھوں نے وحدت کی راہ میں کیا کیا قربانیاں دی ہیں اور ہم جو ان کے نقش قدم پر چلنے کا دعویٰ کرتے ہیں ؛نے وحدت کی راہ میں کیا قدم اٹھائے ہیں ۔

اہل سنّت کے منابع سے پیغمبر اعظم ﷺکی سیرت طیبہ اور وحدت۔
اگر آپ ان کی الٰہی سیرت اٹھا کر دیکھیں تو ان کی زندگی کے ہر قدم پر وحدت کے سینکڑوں نمونے نظر آتے ہیں جو نہ صرف ہمارے لئے اسوہ حسنہ ہے بلکہ تمام بشر یت کے لئے تا قیام قیامت نمونہ عمل ہے ۔آپ ﷺکی پاک سیرت میں وحدت واتحاد کے ایسے نمونے پائے جاتے ہیں جس کی مثال سابقہ امتوں میں نہیں ملتی۔
حد یہ ہے کہ آپ ﷺے مدینہ تشریف لانے کے فورا بعد چند اہم اور بنیادی اقدامات انجام دئیے، ان میں سے ایک قدم مختلف گروہوں ، امتوں اور قوموں کے درمیان وحدت اور اتحاد و اتفاق ایجاد کرنا تھا جو اپنی جگہ بے سابقہ ہے ہم یہاں چند نمونے ذکرکرتے ہیں ۔
ا۔امت واحدہ کی تشکیل میں تاریخی دستاویز

آخری تازہ کاری (بدھ, 01 فروری 2012 17:15)

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PostHeaderIcon हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम  का जीवन परिचय

नाम व लक़ब(उपाधि)

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का नाम जाफ़र व आपका मुख्य लक़ब सादिक़ है।

माता पिता

हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम हज़रत इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत  उम्मे फ़रवा पुत्री क़ासिम पुत्र मुहम्मद पुत्र अबुबकर हैं।

जन्म तिथि व जन्म सथान

آخری تازہ کاری (بدھ, 01 فروری 2012 17:28)

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PostHeaderIcon معصومین علیہم السلام کے روضوں کی زیارت


حدیث
امام حسین (ع) کے چند زرین اقوال حدیث -۱- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” یا اعرابی نحن قوم لا نعطی المعروف الا علی قدر المعرفة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” ہم اہل بیت بخشش نہیں کرتے مگر لوگوں کی معرفت کے مطابق“۔ حدیث -۲- قال الامام الحسین علیہ السلام : ” ان اجود الناس من اعطی من لا یرجوہ “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” سب سے بڑا سخی وہ انسان ہے جو کسی ایسے کو عطا کرے جس سے کسی قسم کی توقع نہ ہو “ حدیث -۳- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان اعفیٰ الناس من عفا عن قدرة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” سب سے بڑا عفو کرنے والا انسان وہ ہے جو قدرت ہونے کے باوجود معاف کر دے “ ۔ حدیث -۴- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان اوصل الناس من وصل من قطعہ “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” سب سے زیادہ صلہٴ رحم کرنے والا انسان وہ ہے جو قطع رحم کرنے والوں سے تعلقات قائم کرے “ ۔ حدیث -۵- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” من نفس کربة مومن فرج اللہ عنہ کرب الدنیا و الاخرة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” جو کسی مومن کے کرب و غم کو دور کرے ،خدا اسکے دنیا و آخرت کے غم و اندوہ کو دور کرے گا “۔ حدیث -۶- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” موت فی عز خیر من حیات فی ذل “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” ذلت کی زندگی سے عزت کی موت کہیں بہتر ہے “ ۔ حدیث -۷- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان حوائج الناس الیکم من نعم اللہ علیکم فلا تملوا النعم فتحور نقما “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” خدا کی نعمتوں میں سے ایک، لوگوں کو تمھارے پاس حاجت کے لئے آنا ہے پس اس نعمت پر حزن و ملال محسوس نہ کرو ورنہ یہ نعمت ، نقمت میں تبدیل ہو جائیگی “۔ حدیث -۸- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ایھا الناس من جاد ساد ، و من بخل رذل “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” لوگو! جود و سخاوت کرنے والا سردارقرار پاتا ہے ، اور بخل کرنے والا ذلیل و رسوا ہوتا ہے “۔ حدیث -۹- قال الامام الحسین علیہ السلام: ”ان المومن لا یسئی و لا یعتذر والمنافق کل یوم یسئی و یعتذر “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” مومن نہ برائی کرتا ہے نہ ہی عذر پیش کرتا ہے جب کہ منافق ہر روز برائی کرتا ہے اور ہر روز عذر خواہی کرتا ہے “ ۔ حدیث -۱۰- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” من احبک نھاک و من ابغضک اغراک “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ”دوست وہ ہے جو تمہیں برائی سے بچائے دشمن وہ ہے جو تمہیں برائیوں کی ترغیب دلائے “۔ حدیث -۱۱- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” انی لا اری الموت الا سعادہ ولا الحیاة مع الظالمیں الابرما “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” میں موت کو سعادت اور ظالموں کے ساتہ زندگی کو لائق ملامت سمجہتا ہوں “इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम 1- मित्र व शत्रु हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि आपका मित्र वह है जो आपको बुराईयों से रोके व आप का शत्रु वह है जो आपको बुरे कार्यों का निमन्त्रण दे। 2- वसीयत हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि अल्लाह से डरो व अपने स्वास्थ का ध्यान रखकर अपनी आयु को बढ़ाओ। और उन लोगों की भाँती न बनो जो दूसरों को पाप से डराते हैं परन्तु स्वंय पाप से नहीं डरते। 3- जिहाद के प्रकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि जिहाद चार प्रकार के हैं इन मे से दो जिहाद सुन्नत हैं तथा दो जिहाद फ़र्ज़ हैं। क- फ़र्ज़ जिहाद – (अ) व्यक्ति का स्वंय अपने वश से लड़ना (अर्थात व्यक्ति अल्लाह के आदेशों की अवहेलना न करना) तथा यह महान् जिहाद है। (आ) नास्तिक लोगों के साथ लड़ना ख- सुन्नत जिहाद (अ) शत्रु से जिहाद तथा यह जिहाद प्रत्येक उम्मत(समाज) पर अनिवार्य किया गया है। अगर यह जिहाद न किया जाये तो उम्मत(समाज) संकट मे घिर जायेगी और यह संकट स्वंय उम्मत द्वारा उत्पन्न किया गया होगा। इस प्रकार का जिहाद सुन्नत है। तथा इस जिहाद की सीमा यहाँ तक है कि इमाम उम्मत के साथ शत्रु की खोज मे निकले तथा उनसे जिहाद करे। (आ) दूसरा सुन्नत जिहाद यह है कि मनुष्य सुन्नतों को क्रियान्वित करने के लिए प्रयास करे। हज़रत पैगम्बर ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति जो सुन्नतों व अच्छाईयों को क्रियान्वित करता है उसको उसके कार्यो का बदला दिया जायेगा। तथा क़ियामत तक जो व्यक्ति उसके द्वारा क्रियान्वित सुन्नत पर पगबध होंगे उनका पुण्य भी उसको दिया जायेगा इस प्रकार कि उस सुन्नत पर पगबध होने वालों के पुण्य मे कोई कमी नही की जायेगी। 4- संसार का बदला रूप हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला की यात्रा के समय कहा कि संसार परिवर्तित व अपरिचित होगया है। इसने परिचितों की ओर से मुहँ मोड़ लिया है। यह संसार केवल एक चरी हुई चरागाह के समान शेष रह गया है। क्या आप नही देखते कि हक़ (शोभनीय) पर अमल नही हो रहा है व बातिल(अशोभनीय) से मना नही किया जारहा है। ऐसी स्थिति मे मोमिन (आस्तिक) का मरजाना ही अच्छा है। इस स्थिति मे मैं मृत्यु को भलाई तथा अत्याचारियों के साथ जीवित रहने को मृत्यु समझता हूँ। वास्तव मे लोग संसारिक मोह माया मे फसे हैं व धर्म केवल उनके कथन तक सीमित है। जब उनको विपत्ति के समय परखा जाता है तो धार्मिक लोग कम निकलते हैं। 6 –नेअमतो की अधिकता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह जब किसी को अपनी ओर से ग़ाफ़िल (निश्चेत) करता है तो उसको अधिक नेअमते प्रदान करता है। तथा उससे शुक्रिये (धन्यवाद) की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) ले लेता है। 7- इबादत(आराधना) हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि एक समुदाय अल्लाह की इबादत स्वर्ग प्राप्ति के लिए करता है। तथा यह इबादत व्यापारियों वाली इबादत है। एक समुदाय अल्लाह की इबादत नरक के भय के कारण करता है। तथा यह इबादत दासों वाली इबादत है। एक समुदाय अल्लाह की इबादत इस लिए करता है कि अल्लाह को इबादत योग्य समझता है।तथा यह इबादत सर्वश्रेष्ठ इबादत है व सवतन्त्रता का संकेत देती है। 8- अत्याचार न करो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के अतिरिक्त जिसकी कोई सहायता करने वाला न हो उस व्यक्ति पर कभी भी अत्याचार न करो। 9- आवश्यकता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इन तीन लोगों के अतिरिक्त आपकी अवश्यक्ता को कोई पूरा नही कर सकता (1) दीनदार (अर्थात धार्मिक व्यक्ति ) (2) वीर पुरूष (3) अच्छा व्यक्तित्व रखने वाला। 10- बुद्धि मत्ता व मूर्खता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि बुद्धिजीवियों की संगत मे बैठना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।मुसलमानो का आपस मे झगड़ना मूर्खता का प्रतीक है। अपने कथन की स्वंय आलोचना करना ज्ञानी होने का प्रतीक है। 11- नरक से मुक्ति हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के भय से रोना नरक से मुक्ति का कारक है। 12- कंजूस हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि दूसरों को सलाम करने से बचने वाला व्यक्ति कंजूस है। 13- पापीयों के अनुसरण का पल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगर कोई किसी के पास अल्लाह के आदेशों की अवहेलने करने के लिए एकत्रित हों तो वह जो इच्छायें ऱखते उनकी की पूर्ति न होगी और वह जिन चीज़ों से बचना चाहते हैं उनमे ग्रस्त हो जायेंगे। 14- नीचता स्वीकार नही करूँगा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अल्लाह की सौगन्ध के साथ कहता हूं कि मैं कभी भी नीचता को स्वीकार नही करूँगा तथा क़ियामत (प्रलय ) के दिन हज़रत फ़ातिमा ज़हरा अपने हज़रत पिता से भेंट करेगीं और उन समस्त अत्याचारों की अपने पिता से शिकायत करेंगी जो पैगम्बर की उम्मत ने उनकी संतान पर किये हैं। और वह व्यक्ति जिसने हज़रत फ़ातिमा की संतान पर अत्याचार किये वह स्वर्ग मे नही जासकता। 15- क़ियाम(आन्दोलन) के उद्देश्य हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अपने आपको मनवाने, सुखमय जीवन व्यतीत करने,उपद्रव मचाने या अत्याचार करने के लिए नही निकला हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ कि इस्लामी समाज मे सुधार करू तथा लोगों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करूँ व बुराईयों से रोकूँ व अपने नाना व पिता की सुन्नत(शैली) को क्रियान्वित करूँ। 16- शासन का अधिकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि हम अहलेबैत शासन के शासन कर रहे लोगों से अधिक हक़दार हैं। 17- इमाम के लक्षण हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इमाम वह है जो कुऑनानुसार कार्य करे,न्याय के मार्ग पर चले व हक़ का अनुसरण करे तथा स्वंय को अल्लाह की प्रसन्नता के लिए समर्पित करदे। 18- शासन का अधिकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखने चाहते हो तो यह कार्य अल्लाह की प्रसन्नता के लिए बहुत अच्छा है।हम पैगम्बर के अहलेबैत शासन के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों से अधिक अधिकारी हैं। 19- अत्याचार के सम्मुख चुप रहने का फल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो पैगम्बर ने कहा कि अगर कोई देखे कि एक अत्याचारी शासक अल्लाह द्वारा हराम की गयी चीज़ों को हलाल कर रहा है, अपने वचन से फिर रहा है, पैगम्बर की सुन्नत का विरोध कर रहा है, तथा लोगों के मध्य गुनाह व अत्याचार के आधार पर कार्य कर रहा है।तो अगर कोई इस स्थिति मे उसका क्रियात्मक व विचारात्मक विरोध न करे तो वह भी उस अत्याचारी के साथ ही नरक मे डाला जायेगा। 20- अल्लाह को नाराज़ करना हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि वह व्यक्ति कभी भी सफल नही हो सकते जो अल्लाह की प्रजा को प्रसन्न करने के लिए अल्लाह को नाराज़ करदे।
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