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اصلی صفحه हिन्दी अक़ाऐद इमामत कुरान और हदीस की रोशनी में

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इमामत कुरान और हदीस की रोशनी में

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की शहादत के बाद इस्लामी समाज में पैग़म्बर (स.) के जानशीन (उत्तराधिकारी) और खिलाफ़त का मसला सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण था। एक गिरोह ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के कुछ असहाब के कहने पर हज़रत अबू बकर को पैग़म्बर (स.) का ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) चुन लिया, लेकिन दूसरा गिरोह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के हुक्म के अनुसार हज़रत अली (अ. स.) की खिलाफ़त के ईमान पर अटल रहा। एक लम्बा समय बीतने के बाद पहला गिरोह अहले सुन्नत व अल- जमाअत के नाम से और दूसरा गिरोह शिया के नाम से मशहूर हुआ।

यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि शिया व सुन्नी के बीच जो अन्तर पाया जाता है वह सिर्फ पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन के आधार पर नहीं है, बल्कि इमाम के मअना व मफ़हूम के बारे में भी दोनों मज़हबो (सम्प्रदायों) के दृष्टिकोणों में बहुत ज़्यादा फर्क पाया जाता है। अतः इसी आधार पर दोनों मज़हब एक दूसरे से अलग हो गये हैं।

हम यहाँ पर इस बात की वज़ाहत (व्याख़्या) के लिए (इमाम और इमामत) के मअना की तहक़ीक़ करते हैं ताकि दोनों के नज़रिये स्पष्ट हो जायें।

शाब्दिक आधार पर इमामत का अर्थ व मअना नेतृत्व व रहबरी हैं और एक निश्चित मार्ग में किसी गिरोह की सर परस्ती करने वाले ज़िम्मेदार को इमाम कहा जाता है। मगर दीन की इस्तलाह (धार्मिक व्याख़यानो व लेखों में प्रयोग होने वाले विशेष शब्दों को इस्तलाह कहा जाता है) में इमामत के विभिन्न अर्थ व मअना उल्लेख हुए हैं।

सुन्नी मुसलमानों के नज़रिये के अनुसार इमामत दुनिया की बादशाही का नाम है और इस के द्वारा इस्लामी समाज का नेतृत्व किया जाता है। अतः जिस तरह हर समाज को एक रहबर व उच्च नेतृत्व की ज़रुरत होती है और उसमें रहने वाले लोग अपने लिए एक रहबर को चुनते हैं, इसी तरह इस्लामी समाज के लिए भी ज़रुरी है कि वह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के बाद अपने लिए एक रहबर का चुनाव करे, और चूँकि इस्लाम धर्म में इस चुनाव के लिए कोई खास तरीका निश्चित नहीं किया गया है इस लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (उत्तराधिकारी) के चुनाव के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाया जा सकता है। जैसे- जिसे पब्लिक या बुज़ुर्गों का अधिक समर्थन मिल जाये या जिसके लिए पहला जानशीन वसीयत करदे या जो बगावत कर के या फौजी ताक़त का प्रयोग कर के हुकूमत पर क़ब्ज़ा कर ले।

लेकिन शिया मुसलमानों का मत है कि हज़रत मुहम्मद (स.) अल्लाह के आख़िरी पैग़म्बर थे और उनके बाद पैग़म्बरी ख़त्म हो गई। उनके बाद पैग़म्बरी की जगह इमामत ने लेली अर्थात अल्लाह ने इंसानों की हिदायत के लिए पैग़म्बर के स्थान पर इमाम भेजने शुरू कर दिये। इमाम मखलूक के बीच अल्लाह की हुज्जत और उसके फ़ैज़ का वास्ता होता है। अतः शिया इस बात पर यक़ीन व ईमान रखते हैं कि इमाम को सिर्फ अल्लाह निश्चित व नियुक्त करता है और उसे पैग़म्बर, वही का पैग़ाम लाने वाले के द्वारा पहचनवाता है। यह नज़रिया इमामत की अज़मत और बलन्दी (महानता) के साथ शिया फ़िक्र में पाया जाता है। इस नज़रिये के अनुसार इमाम का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक है वह इस्लामी समाज का सरपरस्त होता है और अल्लाह के अहकाम को बयान करता है, क़ुरआन का मुफ़स्सिर होता है और इंसानों को राहे सआदत (कल्याण व निजात) की हिदायत करता हैं। बल्कि इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शिया संस्कृति में “इमाम” पब्लिक की दीन और दुनिया की मुश्किलों को हल करने वाले व्यक्तित्व का नाम है। इसके विपरीत अहले सुन्नत का मानना यह है कि खलीफ़ा या इमाम की ज़िम्मेदारी सिर्फ दुनिया से संबंधित कामों में हुकूमत करना है।

इमाम की ज़रुरत

इन नज़रीयों के उल्लेख के बाद अब इस सवाल का जवाब देना उचित है कि कुरआने करीम और सुन्नते पैग़म्बर (स.) के बावजूद इमाम की क्या ज़रुरत है ? इमाम की ज़रुरत के लिए बहुत से दलीलें पेश की गई हैं लेकिन हम यहाँ पर उन में से सिर्फ़ एक को अपने सादे शब्दों में पेश कर रहे हैं।

जिस दलील के द्वारा नबियों (अ. स.) की ज़रुरत साबित होती है, वही दलील इमाम की ज़रुरत को भी साबित करती है। एक बात तो यह कि क्यों कि इस्लाम आखरी दीन है और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) अल्लाह की तरफ़ से आने वाले आखरी पैग़म्बर हैं, अतः ज़रूरी है कि इस्लाम में इतनी व्यापकता हो कि वह क़ियामत तक की इंसानों की सारी ज़रुरतों को पूरा कर सके। दूसरी बात यह कि कुरआने करीम में इस्लाम के उसूल (आधारभूत सिद्धान्त), अहकाम (आदेश) और इलाही तालीमों (शिक्षाओं) को आम व आंशिक रूप में उल्लेख किया गया हैं और उनकी तफ़्सीर व व्याख़्या पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के ज़िम्मे है।<1>

यह बात स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने मुसलमानों के हादी और रहबर के रूप में ज़माने की ज़रुरतों के अनुसार और अपने ज़माने के इस्लामी समाज की योग्यता के अनुरूप अल्लाह की आयतों को बयान किया अतः पैग़म्बर इस्लाम (स.) के लिए आवश्यक है कि अपने बाद वाले ज़माने के लिए कुछ ऐसे लायक जानशीनों को छोड़ें जो ख़ुदा वन्दे आलम के ला महदूद (अपार व असीमित) इल्म के दरिया से संबंधित हो ताकि जिन चीज़ों को पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने बयान नहीं किया, वह उनको बयान करें और हर ज़माने में इस्लामी समाज की ज़रूरतों को पूरा करते रहें ।

इसी लिए इमाम (अ. स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की छोड़ी हुई मिरास के मुहाफिज़ (रक्षा करने वाले), कुरआने करीम के सच्चे मुफ़स्सिर और उस के सही मअना बयान करने वाले हैं, ताकि अल्लाह का दीन स्वार्थी दुशमनों के द्वारा तहरीफ (परिवर्तन) का शिकार न हो और यह पाक व पाक़ीज़ा दीन क़ियामत तक बाकी रहे।

इसके अलावा, इमाम इंसाने कामिल (पूर्ण रूप से विकसित इन्सान) के रूप में इन्सानियत के तमाम पहलुओं में नमूनए अमल (आदर्श) है। क्यों कि इन्सानियत को एक ऐसे नमूने की सख्त ज़रुरत है जिसकी मदद और हिदायत के द्वारा इंसानी सामर्थ्य के अनुसार तरबियत (प्रशिक्षण) पा सके और इन आसमानी प्रशिक्षकों के आधीन रह कर भटकाव व अपने नफ्स की इच्छाओं के जाल और बाहरी शैतानों से सुरक्षित रह सके।

उपरोक्त विवरण से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि जनता को इमाम की बहुत ज़रुरत है और इमाम की ज़िम्मेदारियाँ निमन लिखित हैं।

१-समाज का नेतृत्व व समाजी मुश्किलों का समाधान करना अर्थात हुकूमत की की स्थापना।

२-पैग़म्बरे इस्लाम के दीन को तहरीफ़ (परिवर्तन) से बचाना और कुरआन के सही मअनी बयान करना।

३-लोगों के दिलों का तज़किया करना अर्थात उन्हें पवित्र बनाना और उन की हिदायत करना।<2>

इमाम की विशेषताएं

पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जानशीन अर्थात इमाम, दीन को ज़िन्दा रखता और इंसानी समाज की ज़रुरतों को पूरा करता है। इमाम के व्यक्तित्व में इमामत के महान पद के कारण कुछ विशेषताएं पाई जाती हैं जिन में से कुछ मुख़्य विशेषताएं निम्न लिखित हैं।

१-इमाम, मुत्तक़ी, परहेज़गार और मासूम होता है, जिसकी वजह से उससे एक छोटा गुनाह भी नहीं हो सकता।

२-इमाम के इल्म का आधार पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का इल्म होता है और वह अल्लाह के इल्म से संपर्क में रहता है, अतः वह भौतिक व आध्यात्मिक, दीन और दुनिया की तमाम मुश्किलों के हल का ज़िम्मेदार होता है।

३-इमाम में तमाम फ़ज़ायल (सदगुण) मौजूद होते हैं और वह उच्च अख़लाक़ का मालिक होता है।

४-दीन के आधार पर इंसानी समाज को सही रास्ते पर चलाने की योग्यता रखता है।

उरोक्त वर्णित विशेषताओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि इमाम का चुनाव जनता के बस से बाहर है। अतः सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम ही अपने असीम इल्म के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (इमाम) का चुनाव कर सकता है। अतः इमाम की विशेषताओं में सब से बड़ी व मुख्य विशेषता उसका ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से मन्सूब नियुक्त) होना है।

प्रियः पाठको इमाम की इन विशेषताओं के महत्व को ध्यान में रखते हुए हम यहाँ पर इन में से हर विशेषता के बारे में संक्षेप में लिख रहे

हैं।

इमाम का इल्म

इमाम, जिस पर लोगों की हिदायत और रहबरी की ज़िम्मेदारी होती है, उसके लिए ज़रुरी है कि दीन के तमाम पहलुओं को पहचानता हो और उसके क़ानूनों से पूर्ण रूप से परिचित हो। कुरआने करीम की तफ़्सीर को जानता हो और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की सुन्नत को भी पूरी तरह से जानता हो ताकि अल्लाह को पहचनवाने वाली चीज़ों और दीन की शिक्षाओं को भली भाँती स्पष्ट रूप से बयान करे और जनता के विभिन्न सवालों के जवाब दे तथा उनका बेहतरीन तरीके से मार्गदर्शन करे। स्पष्ट है कि ऐसी ही इल्म रखने वाले इंसान पर लोगों को विश्वास हो सकता है, और ऐसा इल्म सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम के असीम इल्म से संमपर्क रहने की सूरत में ही मुम्किन है। इसी वजह से शिया इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के जानशीन (इमाम) का इल्म ख़ुदा के असीम इल्म से संबंधित होता है।

हज़रत इमाम अली (अ. स.) सच्चे इमाम की निशानियों के बारे में फरमाते हैं।

“इमाम, अल्लाह के द्वारा हलाल व हराम किये गये कामों, विभिन्न आदेशों, अल्लाह के अम्र व नही और लोगों की ज़रुरतों का सब से ज़्यादा जानने वाला होता है।<3>

इमाम की इस्मत

इमाम की महत्वपूर्ण विशेषताओं और इमामत की आधारभूत शर्तों में से एक शर्त इस्मत है। (इस्मत यानी इमाम का मासूम होना) इस्मत एक ऐसा मल्का है जो हक़ीक़त के इल्म और मज़बूत इरादे से वजूद में आता है। चूँकि इमाम में ये दोनों चीज़ें पाई जाती हैं इस लिए वह हर गुनाह और खता से दूर रहता है। इमाम भी दीन की शिक्षाओं को जानने, उन्हें बयान करने, उन पर अमल करने और इस्लामी समाज की अच्छाईयों और बुराईयों की पहचान के बारे में ख़ता व ग़लती से महफूज़ रहता है।

इमाम की इस्मत के लिए कुरआन, सुन्नत और अक्ल से बहुत सी दलीलें पेश की गई हैं। उन में से कुछ महत्वपूर्ण दलीलें निम्न लिखित हैं हैं।

दीन और दीनदारी की हिफाज़त इमाम की इस्मत पर आधारित है। क्यों कि इमाम पर लोगों को दीन की तरफ़ हिदायत करने और दीन को तहरीफ़ (परिवर्तन) से बचाये रखने की ज़िम्मेदारी होती है। इमाम का कलाम (प्रवचन), उनका व्यवहार और उनके द्वारा अन्य लोगों के कामों का समर्थन या खंडन करना समाज के लिए प्रभावी होता हैं। अतः इमाम दीन को समझने और उस पर अमल करने (क्रियान्वित होने) में हर ख़ता व ग़लती से सुरक्षित होना चाहिए ताकि अपने मानने वालों को सही तरीके से हिदायत कर सके।

समाज को इमाम की ज़रुरत की एक दलील यह भी है कि जनता दीन, दीन के अहकाम और शरियत के क़ानूनों को समझने में खता व गलती से ख़ाली नहीं हैं। अतः अगर उनका रहबर, इमाम या हादी भी उन्हीँ की तरह हो तो फिर उस इमाम पर किस तरह से भरोसा किया जा सकता है ? दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि अगर इमाम मासूम न हो तो जनता उसका अनुसरन करने और उसके हुक्म पर चलने में शक व संकोच करेगी।<4>

इमाम की इस्मत पर कुरआने करीम की आयतें भी दलालत करती हैं जिन में सूरह ए बकरा की 124 वीं आयत है, इस आयते शरीफ़ा में बयान हुआ है कि जब ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे इब्राहीम (अ। स.) को नबूवत के बाद इमामत का बलन्द (उच्च) दर्जा दिया तो उस मौक़े पर हज़रत इब्राहीम (अ. स.) ने ख़ुदा वन्दे आलम की बारगाह में दुआ की कि इस ओहदे को मेरी नस्ल में भी बाक़ी रखना, जनाबे इब्राहीम (अ.स.) की इस दुआ पर ख़ुदा वन्दे आलम ने फरमायाः

यह मेरा ओहदा (इमामत) ज़ालिमों और सितमगरों तक नहीं पहुच सकता, यानी इमामत का यह ओहदा हज़रत इब्राहीम (अ. स.) की नस्ल में उन लोगों तक पहुंचेगा जो ज़ालिम नही होंगे।

हालांकि कुरआने करीम ने ख़ुदा वन्दे आलम के साथ शिर्क को अज़ीम ज़ुल्म क़रार दिया है और अल्लाह के हुक्म के विपरीत काम करने को अपने नफ़्स (आत्मा) पर ज़ुल्म माना है और यह गुनाह है। यानी जिस इंसान ने अपनी ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से में कोई गुनाह किया है, वह ज़ालिम है अतः वह किसी भी हालत में इमामत के ओहदे के योग्य नहीं हो सकता है।

दूसरे शब्दो में यह कह सकते हैं कि इस बात में कोई शक नहीं है कि जनाबे इब्राहीम (अ. स.) ने इमामत को अपनी नस्ल में से उन लोगों के लिए नहीं मांगा था, जिन की पूरी उम्र गुनाहों में गुज़रे या जो पहले नेक हों और बाद में बदकार हो जायें। अगर इस बात को आधार मान कर चलें तो सिर्फ दो किस्म के लोग बाक़ी रह जाते हैं।

वह लोग जो शुरु में गुनहगार थे, लेकिन बाद में तौबा कर के नेक हो गए।

वह लोग जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कोई गुनाह न किया हो।

ख़ुदा वन्दे आलम ने अपने कलाम में पहली किस्म को अलग कर दिया, यानी पहले गिरोह को (वह लोग जो शुरु में गुनहगार थे, लेकिन बाद में तौबा कर के नेक हो गए।) इमामत नहीं मिलेगी इस का नतीजा यह निकलता है कि इमामत का ओहदा सिर्फ़ दूसरे गिरोह से मख्सूस हैं, यानी उन लोगों से जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कोई गुनाह न किया हो।

इमाम, समाज को व्यवस्थित करने वाला होता है

चूँकि इंसान एक समाजिक प्राणी है और समाज इसके दिल व जान और व्यवहार को बहुत ज़्यादा प्रभावित करता है, अतः इंसान की सही तरबियत और अल्लाह की तरफ़ बढ़ने के लिए समाजिक रास्ता हमवार होना चाहिए और यह चीज़ इलाही और दीनी हुकूमत के द्वारा ही मुम्किन हो सकती है। अतः ज़रूरी है कि लोगों का इमाम व हादी ऐसा होना चाहिए जिसमें समाज को चलाने व उसे दिशा देने की योग्यता पाई जाती हो और वह कुरआन की शिक्षाओं और नबी की सुन्नत (कार्य शैली) का सहारा लेते हुए बेहतरीन तरीके से इस्लामी हुकूमत की बुनियाद डाल सके।

इमाम का अख़लाक बहुत अच्छा होता है

इमाम चूँकि पूरे इंसानी समाज का हादी (मार्गदर्शक) होता है अतः उसके लिए ज़रूरी है कि वह तमाम बुराईयों से पाक हो और उसके अन्दर बेहतरीन अख़लाक पाया जाता हो, क्यों कि वह अपने मानने वालों के लिए इंसाने कामिल का बेहतरीन नमूना माना जाता है।

हज़रत इमामे रिज़ा (अ. स.) फरमाते हैं कि :

इमाम की कुछ निशानियां होती हैं, जैसे, वह सब से बड़ा आलिम, सब से ज़्यादा नेक, सब से ज़्यादा हलीम (बर्दाश्त करने वाला), सब से ज़्यादा बहादुर, सब से ज़्यादा सखी (दानी) और सब से ज़्यादा इबादत करने वाला होता है।<5>

इसके अलावा चूँकि इमाम, पैग़म्बरे इस्लाम (स।) का जानशीन (उत्तराधिकारी) होता है, और वह हर वक़्त इंसानों की तालीम व तरबियत की कोशिश करता रहता है अतः उसके लिए ज़रूरी है कि वह अख़लाक़ के मैदान में दूसरों से ज़्यादा से सुसज्जित हो।

हज़रत इमाम अली (अ. स.) फरमाते हैं कि :

जो इंसान (अल्लाह के हुक्मे) ख़ुद को लोगों का इमाम बना ले उसके लिए ज़रुरी है कि दूसरों को तालीम देने से पहले ख़ुद अपनी तालीम के लिए कोशिश करे, और ज़बान के द्वारा लोगों की तरबियत करने से पहले, अपने व्यवहार व किरदार से दूसरों की तरबियत करे।<6>

इमाम ख़ुदा की तरफ़ से मंसूब (नियुक्त) होता है

शिया मतानुसार पैग़म्बर (स.) का जानशीन (इमाम) सिर्फ अल्लाह के हुक्म से चुना जाता है और वही इमाम को मंसूब (नियुक्त) करता है। जब अल्लाह किसी को इमाम बना देता है तो पैग़म्बर (स.) उसे इमाम के रूप में पहचनवाते हैं। अतः इस मसले में किसी भी इंसान या गिरोह को हस्तक्षेप का हक़ नहीं है।

इमाम के अल्लाह की तरफ़ से मंसूब होने पर बहुत सी दलीलें है, उनमें से कुछ निमन लिखित हैं।

कुरआने करीम के अनुसार ख़ुदा वन्दे आलम तमाम चीज़ों पर हाकिमे मुतलक़ (जो समस्त चीज़ों को हुक्म देता है या जिसका हुक्म हर चीज़ पर लागू होता है, उसे हाकिमे मुतलक़ कहते हैं।) है और उसकी इताअत (अज्ञा पालन) सब के लिए ज़रुरी है। ज़ाहिर है कि यह हाकमियत ख़ुदा वन्दे आलम की तरफ़ से (इसकी योग्यता रखने वाले) किसी भी इंसान को दी जा सकती है। अतः जिस तरह नबी और पैग़म्बर (अ. स.) ख़ुदा की तरफ़ से नियुक्त होते हैं, उसी तरह इमाम को भी ख़ुदा नियुक्त करता है और इमाम लोगों पर विलायत रखता है यानी उसे समस्त लोगों पर पूर्ण अधिकार होता है।

इस से पहले (ऊपर) इमाम के लिए कुछ खास विशेषताएं लिखी गई हैं जैसे इस्मत, इल्म आदि...., और यह बात स्पष्ट है कि इन ऐसी विशेषताएं रखने वाले इंसान की पहचान सिर्फ़ ख़ुदा वन्दे आलम ही करा सकता है, क्यों कि वही इंसान के ज़ाहिर व बातिन (प्रत्यक्ष व परोक्ष) से आगाह है, जैसा कि ख़ुदा वन्दे आलम कुरआने मजीद में जनाबे इब्राहीम (अ. स.) को संबोधित करते हुए फरमाता हैः

हम ने, तुम को लोगों का इमाम बनाया।<7>

सबसे अच्छी बात

अपनी बात के इस आखरी हिस्से में हम उचित समझते हैं कि आठवें इमाम हज़रत अली रिज़ा (अ.स.) की वह हदीस बयान करें जिसमें इमाम (अ. स.) इमाम की विशेषताओं का वर्णन किया है।

इमाम (अ. स.) ने कहा कि : जिन्होंने इमामत के बारे में मत भेद किया और यह समझ बैठे कि इमामत एक चुनाव पर आधारित मसला है, उन्होंने अपनी अज्ञानता का सबूत दिया।....... क्या जनता जानती है कि उम्मत के बीच इमामत की क्या गरीमा है, जो वह मिल बैठ कर इमाम का चुनाव कर ले।

इसमें कोई शक नही है कि इमामत का ओहदा बहुत बुलन्द, उच्च व महत्वपूर्ण है और उस की गहराई इतनी ज़्यादा है कि लोगों की अक्ल उस तक नहीं पहुँच पाती है या वह अपनी राय के द्वारा उस तक नहीं पहुँच सकते हैं।

बेशक इमामत वह ओहदा है कि ख़ुदा वन्दे आलम ने जनाबे इब्राहीम (अ. स.) को नबूवत व खुल्लत देने के बाद तीसरे दर्जे पर इमामत दी है। इमामत अल्लाह व रसूल (स.) की ख़िलाफ़त और हज़रत अमीरुल मोमेनीन अली (अ. स.) व हज़रत इमाम हसन व हज़रत इमाम हुसैन (अ. स.) की मीरास है।

सच्चाई तो यह है कि इमामत, दीन की बाग ड़ोर, मुसलमानों के कामों की व्यवस्था की बुनियाद, मोमिनीन की इज़्ज़त, दुनिया की खैरो भलाई का ज़रिया है और नमाज़, रोज़ा, हज, जिहाद, के कामिल होने का साधन है।, इमाम के ज़रिये ही (उस की विलायत को क़बूल करने की हालत में) सरहदों की हिफ़ाज़त होती है।

इमाम अल्लाह की तरफ़ से हलाल कामों को हलाल और उसकी तरफ़ से हराम किये गये कामों को हराम करता है। वह ख़ुदा वन्दे आलम के हक़ीक़ी हुक्म के अनुसार हुक्म करता है) हुदूदे उलाही को क़ायम करता है, ख़ुदा के दीन की हिमायत करता है, और हिकमत व अच्छे वाज़ व नसीहत के ज़रिये, बेहतरीन दलीलों के साथ लोगों को ख़ुदा की तरफ़ बुलाता है।

इमाम सूरज की तरह उदय होता है और उस की रौशनी पूरी दुनिया को प्रकाशित कर देती है, और वह ख़ुद उफ़क़ (अक्षय) में इस तरह से रहता है कि उस तक हाथ और आँखें नहीं पहुँच पाते। इमाम चमकता हुआ चाँद, रौशन चिराग, चमकने वाला नूर, अंधेरों, शहरो व जंगलों और दरियाओं के रास्तों में रहनुमाई (मार्गदर्शन) करने वाला सितारा है, और लड़ाई झगड़ों व जिहालत से छुटकारा दिलाने वाला है।

इमाम हमदर्द दोस्त, मेहरबान बाप, सच्चा भाई, अपने छोटे बच्चों से प्यार करने वाली माँ जैसा और बड़ी - बड़ी मुसीबतों में लोगों के लिए पनाह गाह होता है। इमाम गुनाहों और बुराईयों से पाक करने वाला होता है। वह मख़सूस बुर्दबारी और हिल्म (धैर्य) की निशानी रखता है। इमाम अपने ज़माने का तन्हा इंसान होता है और ऐसा इंसान होता है, जिसकी अज़मत व उच्चता के न कोई क़रीब जा सकता है और न कोई आलिम उस की बराबरी कर सकता है, न कोई उस की जगह ले सकता है और न ही कोई उस जैसा दूसरा मिल सकता है।

अतः इमाम की पहचान कौन कर सकता है ? या कौन इमाम का चुनाव कर सकता ? यहाँ पर अक़्ल हैरान रह जाती है, आँखें बे नूर, बड़े छोटे और बुद्दीजीवी दाँतों तले ऊँगलियाँ दबाते हैं, खुतबा (वक्ता) लाचार हो जाते हैं और उन में इमाम का श्रेष्ठ कामों की तारीफ़ करने की ताक़त नहीं रहती और वह सभी अपनी लाचारी का इक़रार करते हैं।<8>

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1.कुरआने करीम में पैग़म्बरे अकरम (स.) से कहा गया है कि हम ने तुम पर ज़िक्र (कुरआने करीम) नाज़िल किया ताकि आप उस में बयान होने वाली चीज़ों को लोगों के सामने बयान करें। (सूरह ए नहल, आयत न. 44)

2. यहाँ पर यह बात बताना उचित होगा कि मासूम इमाम के द्वारा (हुकूमत की स्थापना) रास्ता हमवार होने की सूरत में ही मुम्किन है, लेकिन दूसरी तमाम ज़िम्मेदारियाँ (यहां तक कि ग़ैबत के ज़माने में भी) अंजाम देना ज़रुरी है। अगरचे इमाम (अ. स.) के ज़ुहूर और लोगों के दरमियान ज़ाहिर बज़ाहिर होने की सूरत में ये बात सब पर ज़ाहिर है। इस के अलावा दूसरा नुक्ता यह है कि इस हिस्से में जो कुछ बयान हुआ है उस में लोगों की मअनवी (आध्यात्मिक) ज़िन्दगी में इमाम की ज़रुरत है, लेकिन तमाम दुनिया को (वजूदे इमाम) की ज़रुरत है इस मतलब को (ग़ायब इमाम के फ़ायदे) नामक बहस में बयान किया जायेगा।

3.मिज़ानुल हिकमत, जिल्द न. 1, हदीस 861.

4. इस के अलावा अगर इमाम खता व गल्ती से सुरक्षित न हो तो फिर किसी दूसरे इमाम की तलाश की जायेगी ताकि लोगों की यह ज़रुरत पूरी हो सके और अगर वह भी खताओं से सुरक्षित न हो तो उसके फिर किसी तीसरे इमाम को तलाश किया जायेगा और यह सिलसिला इसी तरह आगे बढ़ता चला जायेगा और ऐसा सिलसिला फलसफी लिहाज़ से बातिल और बेबुनियाद है जिस को फलसफे की इस्तेलाह में तसलसुल कहा जाता है।

5.मआनीयुल अख़बार, जिल्द न। 4, पेज न। 102.

6.मिज़ानुल हिकमत, बाब 147, हदीस, 85.

7.सूरह बकरा, आयत न.124

8.उसूले काफ़ी, जिल्द न. 1, बाब 15, हदीस, 1, पेज न. 255,

آخری تازہ کاری (ہفتہ, 26 مارچ 2011 02:36)

 

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حدیث
امام حسین (ع) کے چند زرین اقوال حدیث -۱- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” یا اعرابی نحن قوم لا نعطی المعروف الا علی قدر المعرفة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” ہم اہل بیت بخشش نہیں کرتے مگر لوگوں کی معرفت کے مطابق“۔ حدیث -۲- قال الامام الحسین علیہ السلام : ” ان اجود الناس من اعطی من لا یرجوہ “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” سب سے بڑا سخی وہ انسان ہے جو کسی ایسے کو عطا کرے جس سے کسی قسم کی توقع نہ ہو “ حدیث -۳- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان اعفیٰ الناس من عفا عن قدرة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں :” سب سے بڑا عفو کرنے والا انسان وہ ہے جو قدرت ہونے کے باوجود معاف کر دے “ ۔ حدیث -۴- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان اوصل الناس من وصل من قطعہ “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” سب سے زیادہ صلہٴ رحم کرنے والا انسان وہ ہے جو قطع رحم کرنے والوں سے تعلقات قائم کرے “ ۔ حدیث -۵- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” من نفس کربة مومن فرج اللہ عنہ کرب الدنیا و الاخرة “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” جو کسی مومن کے کرب و غم کو دور کرے ،خدا اسکے دنیا و آخرت کے غم و اندوہ کو دور کرے گا “۔ حدیث -۶- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” موت فی عز خیر من حیات فی ذل “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” ذلت کی زندگی سے عزت کی موت کہیں بہتر ہے “ ۔ حدیث -۷- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ان حوائج الناس الیکم من نعم اللہ علیکم فلا تملوا النعم فتحور نقما “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” خدا کی نعمتوں میں سے ایک، لوگوں کو تمھارے پاس حاجت کے لئے آنا ہے پس اس نعمت پر حزن و ملال محسوس نہ کرو ورنہ یہ نعمت ، نقمت میں تبدیل ہو جائیگی “۔ حدیث -۸- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” ایھا الناس من جاد ساد ، و من بخل رذل “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” لوگو! جود و سخاوت کرنے والا سردارقرار پاتا ہے ، اور بخل کرنے والا ذلیل و رسوا ہوتا ہے “۔ حدیث -۹- قال الامام الحسین علیہ السلام: ”ان المومن لا یسئی و لا یعتذر والمنافق کل یوم یسئی و یعتذر “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ” مومن نہ برائی کرتا ہے نہ ہی عذر پیش کرتا ہے جب کہ منافق ہر روز برائی کرتا ہے اور ہر روز عذر خواہی کرتا ہے “ ۔ حدیث -۱۰- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” من احبک نھاک و من ابغضک اغراک “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں: ”دوست وہ ہے جو تمہیں برائی سے بچائے دشمن وہ ہے جو تمہیں برائیوں کی ترغیب دلائے “۔ حدیث -۱۱- قال الامام الحسین علیہ السلام: ” انی لا اری الموت الا سعادہ ولا الحیاة مع الظالمیں الابرما “ ترجمہ: حضرت امام حسین (ع) علیہ السلام فرماتے ہیں : ” میں موت کو سعادت اور ظالموں کے ساتہ زندگی کو لائق ملامت سمجہتا ہوں “इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम 1- मित्र व शत्रु हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि आपका मित्र वह है जो आपको बुराईयों से रोके व आप का शत्रु वह है जो आपको बुरे कार्यों का निमन्त्रण दे। 2- वसीयत हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि अल्लाह से डरो व अपने स्वास्थ का ध्यान रखकर अपनी आयु को बढ़ाओ। और उन लोगों की भाँती न बनो जो दूसरों को पाप से डराते हैं परन्तु स्वंय पाप से नहीं डरते। 3- जिहाद के प्रकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि जिहाद चार प्रकार के हैं इन मे से दो जिहाद सुन्नत हैं तथा दो जिहाद फ़र्ज़ हैं। क- फ़र्ज़ जिहाद – (अ) व्यक्ति का स्वंय अपने वश से लड़ना (अर्थात व्यक्ति अल्लाह के आदेशों की अवहेलना न करना) तथा यह महान् जिहाद है। (आ) नास्तिक लोगों के साथ लड़ना ख- सुन्नत जिहाद (अ) शत्रु से जिहाद तथा यह जिहाद प्रत्येक उम्मत(समाज) पर अनिवार्य किया गया है। अगर यह जिहाद न किया जाये तो उम्मत(समाज) संकट मे घिर जायेगी और यह संकट स्वंय उम्मत द्वारा उत्पन्न किया गया होगा। इस प्रकार का जिहाद सुन्नत है। तथा इस जिहाद की सीमा यहाँ तक है कि इमाम उम्मत के साथ शत्रु की खोज मे निकले तथा उनसे जिहाद करे। (आ) दूसरा सुन्नत जिहाद यह है कि मनुष्य सुन्नतों को क्रियान्वित करने के लिए प्रयास करे। हज़रत पैगम्बर ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति जो सुन्नतों व अच्छाईयों को क्रियान्वित करता है उसको उसके कार्यो का बदला दिया जायेगा। तथा क़ियामत तक जो व्यक्ति उसके द्वारा क्रियान्वित सुन्नत पर पगबध होंगे उनका पुण्य भी उसको दिया जायेगा इस प्रकार कि उस सुन्नत पर पगबध होने वालों के पुण्य मे कोई कमी नही की जायेगी। 4- संसार का बदला रूप हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला की यात्रा के समय कहा कि संसार परिवर्तित व अपरिचित होगया है। इसने परिचितों की ओर से मुहँ मोड़ लिया है। यह संसार केवल एक चरी हुई चरागाह के समान शेष रह गया है। क्या आप नही देखते कि हक़ (शोभनीय) पर अमल नही हो रहा है व बातिल(अशोभनीय) से मना नही किया जारहा है। ऐसी स्थिति मे मोमिन (आस्तिक) का मरजाना ही अच्छा है। इस स्थिति मे मैं मृत्यु को भलाई तथा अत्याचारियों के साथ जीवित रहने को मृत्यु समझता हूँ। वास्तव मे लोग संसारिक मोह माया मे फसे हैं व धर्म केवल उनके कथन तक सीमित है। जब उनको विपत्ति के समय परखा जाता है तो धार्मिक लोग कम निकलते हैं। 6 –नेअमतो की अधिकता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह जब किसी को अपनी ओर से ग़ाफ़िल (निश्चेत) करता है तो उसको अधिक नेअमते प्रदान करता है। तथा उससे शुक्रिये (धन्यवाद) की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) ले लेता है। 7- इबादत(आराधना) हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि एक समुदाय अल्लाह की इबादत स्वर्ग प्राप्ति के लिए करता है। तथा यह इबादत व्यापारियों वाली इबादत है। एक समुदाय अल्लाह की इबादत नरक के भय के कारण करता है। तथा यह इबादत दासों वाली इबादत है। एक समुदाय अल्लाह की इबादत इस लिए करता है कि अल्लाह को इबादत योग्य समझता है।तथा यह इबादत सर्वश्रेष्ठ इबादत है व सवतन्त्रता का संकेत देती है। 8- अत्याचार न करो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के अतिरिक्त जिसकी कोई सहायता करने वाला न हो उस व्यक्ति पर कभी भी अत्याचार न करो। 9- आवश्यकता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इन तीन लोगों के अतिरिक्त आपकी अवश्यक्ता को कोई पूरा नही कर सकता (1) दीनदार (अर्थात धार्मिक व्यक्ति ) (2) वीर पुरूष (3) अच्छा व्यक्तित्व रखने वाला। 10- बुद्धि मत्ता व मूर्खता हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि बुद्धिजीवियों की संगत मे बैठना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।मुसलमानो का आपस मे झगड़ना मूर्खता का प्रतीक है। अपने कथन की स्वंय आलोचना करना ज्ञानी होने का प्रतीक है। 11- नरक से मुक्ति हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह के भय से रोना नरक से मुक्ति का कारक है। 12- कंजूस हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि दूसरों को सलाम करने से बचने वाला व्यक्ति कंजूस है। 13- पापीयों के अनुसरण का पल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगर कोई किसी के पास अल्लाह के आदेशों की अवहेलने करने के लिए एकत्रित हों तो वह जो इच्छायें ऱखते उनकी की पूर्ति न होगी और वह जिन चीज़ों से बचना चाहते हैं उनमे ग्रस्त हो जायेंगे। 14- नीचता स्वीकार नही करूँगा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अल्लाह की सौगन्ध के साथ कहता हूं कि मैं कभी भी नीचता को स्वीकार नही करूँगा तथा क़ियामत (प्रलय ) के दिन हज़रत फ़ातिमा ज़हरा अपने हज़रत पिता से भेंट करेगीं और उन समस्त अत्याचारों की अपने पिता से शिकायत करेंगी जो पैगम्बर की उम्मत ने उनकी संतान पर किये हैं। और वह व्यक्ति जिसने हज़रत फ़ातिमा की संतान पर अत्याचार किये वह स्वर्ग मे नही जासकता। 15- क़ियाम(आन्दोलन) के उद्देश्य हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं अपने आपको मनवाने, सुखमय जीवन व्यतीत करने,उपद्रव मचाने या अत्याचार करने के लिए नही निकला हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ कि इस्लामी समाज मे सुधार करू तथा लोगों को अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करूँ व बुराईयों से रोकूँ व अपने नाना व पिता की सुन्नत(शैली) को क्रियान्वित करूँ। 16- शासन का अधिकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि हम अहलेबैत शासन के शासन कर रहे लोगों से अधिक हक़दार हैं। 17- इमाम के लक्षण हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि इमाम वह है जो कुऑनानुसार कार्य करे,न्याय के मार्ग पर चले व हक़ का अनुसरण करे तथा स्वंय को अल्लाह की प्रसन्नता के लिए समर्पित करदे। 18- शासन का अधिकार हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखने चाहते हो तो यह कार्य अल्लाह की प्रसन्नता के लिए बहुत अच्छा है।हम पैगम्बर के अहलेबैत शासन के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों से अधिक अधिकारी हैं। 19- अत्याचार के सम्मुख चुप रहने का फल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ लोगो पैगम्बर ने कहा कि अगर कोई देखे कि एक अत्याचारी शासक अल्लाह द्वारा हराम की गयी चीज़ों को हलाल कर रहा है, अपने वचन से फिर रहा है, पैगम्बर की सुन्नत का विरोध कर रहा है, तथा लोगों के मध्य गुनाह व अत्याचार के आधार पर कार्य कर रहा है।तो अगर कोई इस स्थिति मे उसका क्रियात्मक व विचारात्मक विरोध न करे तो वह भी उस अत्याचारी के साथ ही नरक मे डाला जायेगा। 20- अल्लाह को नाराज़ करना हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि वह व्यक्ति कभी भी सफल नही हो सकते जो अल्लाह की प्रजा को प्रसन्न करने के लिए अल्लाह को नाराज़ करदे।
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